दीवारें

जीवन के कई तजुर्बो में से एक तजुर्बा ये भी सीखा के उन लोगो से जिनके पीछे हम भागते रहते हैं, जिनको हम वफादार समझते हैं| उनसे ज्यादा तो वफादार तो उस कमरे की दीवारे होती हैं जो ज़िंदगी के साथ ही खत्म होती हैं | वो कभी साथ नहीं छोड़ती, ना कभी शिकायत करती |

वो बस सुबह से शाम तक हमारे वापिस आने का इंतज़ार करती |
वो जो हमारे राज़ को बिना किसी शर्त के अपने तक रखती|
जो मुसीबत में हमें देखकर हमारा मज़ाक ना उड़ाती.. वो जो घर में आई खुशियों से मुस्कुरा उठती..

लेकिन अफ़सोस तो यही हैं की हम ज़िंदगी भर ये शिकायतों में उलझे रहते हैं की हमको इन दीवारो ने बांध दिया हैं |

जबकि हमारी रातो का सुकून जो इसकी बाँहों की सुरक्षा से मिलता हैं |
इसी दीवारो में ही बसा हुआ हैं |
जिंदगी भर अनजान इसकी वफादारी से, वफादारी तो तब पता चलती हैं जब अपनों का साथ छूटने लगता हैं |

जब बालो की चमक, चाँद सी सफेदी में बदलने लगती हैं |
जब चेहरे पर झुर्रियों का आना और जिंदगी आखिरी दौर का एहसास होता हैं.. जब हमको सिर्फ आशीर्वाद देने के लिए पूछा जाता हैं.. तब ये दीवारे ही एक एक करके उन लोगो की असलियत सामने लाती हैं  जिनके लिये ताउम्र हम पीछे भागते रहे.. खुद को भूल गए..उस अंतिम दौर में यही हमारी सबसे अछि दोस्त भी होती हैं.. हमदर्द भी..और आंसू भी यही बहाती हैं.. 

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